शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

आदिगौड़ ब्राह्मण समाज की वेबसाइट


आप सभी के सहयोग और प्रोत्साहन से आदिगौड़ ब्राह्मण समाज की नयी वेबसाइट बनाने का निर्णय लिया है. नयी वेबसाईट www.aadigaur.com पर कुछ ही दिनों में आपकी सेवा में प्रस्तुत की जा रही है. 
आशा है आपका सहयोग बना रहेगा. 
If you are interested in helping in the noble cause, please contact at the email address.

रविवार, 8 अगस्त 2010

शरीर कैसे नष्ट होता है! अनुगीता में इसकी व्याख्या.

अनुगीता  संस्कृत महाकाव्य महाभारत, अश्वमेधिकापर्व का हिस्सा है. इसमे अर्जुन के साथ कृष्ण की बातचीत के उस समय का वर्णन है, जब कृष्ण पांडवों के लिए राज्य बहाल करने के बाद द्वारका में लौटने का फैसला किया. अनुगीता में मुख्य रूप से आत्मा के स्थानांतरगमन, मोक्ष प्राप्त करने का मतलब, गुणों और आश्रम, धर्म का वर्णन और तपस्या का प्रभाव आदि विषयों पर चर्चा सामिल है. इसके दुसरे अध्याय में शरीर कैसे नष्ट होता है, इसके वारे में व्याख्या इस प्रकार है.

काश्यप उवाच
कथं शरीरं च्यवते कथं चैवोपपद्यते।
कथं कष्टाच्च संसारात्संसरन्परिमुच्यते॥२॥
काश्यप बोले
शरीर कैसे नष्ट होता है तथा कैसे उत्पन्न होता है? और इस संसार में भ्रमण करते हुए किस प्रकार कष्टों से मुक्त होता है?

आत्मा प्रकृतिं मुक्त्वा तच्छरीरं विमुञ्चति।
शरीरतश्च निर्मुक्तः कथमन्यत्प्रपद्यते॥३॥
आत्मा किस प्रकार प्रकृति को त्यागकर उस शरीर से मुक्त होती है? और शरीर से निकलकर कैसे दूसरे शरीर को प्राप्त करती है?

कथं शुभाशुभे चायं कर्मणी स्वकृते नरः।
उपभुङ्क्ते क्व वा कर्म विदेहस्योपतिष्ठति॥४॥
किस प्रकार मनुष्य अपने द्वारा किये शुभ और अशुभ कर्मों को भोगता है? और शरीर छोड़ने के पश्चात् मनुष्य के कर्म कहाँ ठहरते हैं?

ब्राह्मण उवाच
एवं संचोदितः सिद्धः प्रश्नांस्तान्प्रत्यभाषत।
आनुपूर्व्येण वार्ष्णेय तन्मे निगदतः शृणु॥५॥
हे वार्ष्णेय! इस प्रकार पूछने पर उस सिद्ध ने यथाक्रम उन प्रश्नों का उत्तर दिया। वह बताते हुए मुझे सुनो।

सिद्ध उवाच
आयुःकीर्तिकराणीह यानि कर्माणि सेवते।
शरीरग्रहणे यस्मिंस्तेषु क्षीणेषु सर्वशः॥६॥
आयुःक्षयपरीतात्मा विपरीतानि सेवते।
बुद्धिर्व्यावर्तते चास्य विनाशे प्रत्युपस्थिते॥७॥
सिद्ध बोले
शरीर को ग्रहण करने पर मनुष्य आयु और यश प्रदान कराने वाले जिन कर्मों को भोगता है, उन कर्मों के सर्वथा क्षीण हो जाने पर, आयु-क्षय के समीप आने पर वह विपरीत प्रकार के कर्मों को भोगता है। विनाश के उपस्थित होने पर उसकी बुद्धि भी विपरीत दिशा में मुड़ जाती है।

सत्त्वं बलं कालं चाप्यविदित्वात्मनस्तथा।
अतिवेलमुपाश्नाति तैर्विरुद्धान्यनात्मवान्॥८॥
तथा प्रमादपूर्वक अपने सत्त्व, बल तथा काल को बिना जाने उनसे विरुद्ध आत्यधिक भोगों को भोगता है।

यदायमतिकष्टानि सर्वाण्युपनिषेवते।
अत्यर्थमपि वा भुङ्क्ते वा भुङ्क्ते कदाचन॥९॥
जब मनुष्य सभी अतिकष्टदायक कर्म करता है या फिर अत्यधिक भोजन करता है या फिर कभी भी भोजन नहीं करता है;

दुष्टान्नामिषपानं यदन्योन्यविरोधि च।
गुरु चाप्यमितं भुङ्क्ते नातिजीर्णेऽपि वा पुनः॥१०॥
जब यह दुष्ट अन्न या आमिष भोजन या मदिरा का सेवन करता है या ऐसे पदार्थों का सेवन करता है जो एक-दूसरे के विरोधि हैं या अत्याधिक भारी भोजन करता है या पिछले भोजन को बिना पचाये भोजन करता है;

व्यायाममतिमात्रं वा व्यवायं चोपसेवते।
सततं कर्मलोभाद्वा प्राप्तं वेगविधारणम्॥११॥
या जब अत्यधिक व्यायाम करता है या अत्यधिक काम का सेवन करता है या शरीर के मलत्याग की क्रियाओं को रोकता है;

रसातियुक्तमन्नं वा दिवास्वप्नं निषेवते।
अपक्वानागते काले स्वयं दोषान्प्रकोपयन्॥१२॥
या अत्यधिक रस से युक्त भोजन करता है या दिन में स्वप्न देखता है या बिना पके हुए भोजन का सेवन करता है, वह समय आने पर अपने शरीर के दोषों को (वात, पित्त और कफ) प्रकुपति कर देता है

स्वदोषकोपनाद्रोगं लभते मरणान्तिकम्।
अथ चोद्बन्धनादीनि परीतानि व्यवस्यति॥१३॥
आपने शरीर के दोषों के कोप से मृत्यु प्राप्त कराने वाले रोगों से ग्रसित हो जाता है अथवा अपने को फाँसी लगाने जैसे कार्यों में व्यवसित हो जाता है।

तस्य तैः कारणैर्जन्तोः शरीराच्च्यवते यथा।
जीवितं प्रोच्यमानं तद्यथावदुपधारय॥१४॥
इन कारणों से जन्तु के शरीर से जिस प्रकार जीवन का अलगाव होता है, उसे मेरे द्वारा बताते हुए यथावत समझो।

ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः।
शरीरमनुपर्येति सर्वान्प्राणान्रुणद्धि वै॥१५॥
तीव्र वायु के उकसाने पर कुपित ऊष्मा पूरे शरीर को व्याप्त करती है और सभी प्राणों को रोक देती है।

अत्यर्थं बलवानूष्मा शरीरे परिकोपितः।
भिनत्ति जीवस्थानानि तानि मर्माणि विद्धि च॥१६॥
शरीर में अत्याधिक कुपित ऊष्मा जीवस्थानों को भेद देती है। उन स्थानों को मर्म स्थान जानो।

ततः सवेदनः सद्यो जीवः प्रच्यवते क्षरात्।
शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु॥१७॥
तब कष्टपूर्वक जीवात्मा इस क्षर शरीर से अलग हो जाता है। मर्म स्थानों के छेदन होने पर जन्तु अपना शरीर त्याग देता है।

साभार संकलन,  

रविवार, 6 जून 2010

आदि गौड़ समाज का करोली में पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन संपन्न.

गत दिनांक २७ मई २०१० को आदि गौड़ समाज का करोली में पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन ३९ जोड़ो के विवाह के साथ संपन्न हुआ. हम सब की ओर से नवविवाहित एवं उनके परिवारों को सुभकामनाये और सम्मेलन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले तथा अपनी उपस्थिती और आशीर्वाद देने वाले महानुभावों को धन्यवाद. (अधिक जानकारी और चित्रों के लिए Event पेज देखें).

मंगलवार, 16 मार्च 2010

वसंत नवरात्रि, उगादी और गुडी पडवा

 उगादी जिसे युगादी से भी जानते हैं, का मतलब है एक नए युग का प्रारंभ. इस वर्ष उगादी त्यौहार मनाया जा रहा है १६ मार्च २०१० के दिन. इस दिन विक्रमी संवत, सक संवत, सिन्धी नववर्ष तथा तेलगू और कन्नड़ नव वर्ष प्रारंभ होता है.


श्री विक्रम संवत - २०६७
राष्ट्रीय सक संवत - १९३२


इस त्यौहार को भारत में गुडी पडवा, उगादी (कर्णाटक और आंध्र प्रदेश), चेती चाँद (सिन्धी) आदि कई नामों से मानते हैं.


वसंत नवरात्रि (चैत्र नवरात्रि) पूजा भी आज के दिन से प्रारंभ होती है. आज के दिन से ही भगवान राम नवमी उत्सव प्रारंभ होता है. यह दोनों ही उत्सव राम नवमी (नौवे दिन) संपन्न होते हैं.  


समाज बंधुओं को सपरिवार बधाई. 

शनिवार, 6 मार्च 2010

धारण ही धर्म!


भारतवर्ष का मूलाधार 'आध्यात्म ' है, जो धर्म के रूप में भिन्न -भिन्न मान्यताओं एवं आस्थाओं के साथ जनमानस में व्याप्त है। इस संसार में, खास कर भारत वर्ष में सैंकड़ों धर्म है जिनके अपने अलग अलग विधान हैं।
धृ धारण पोषणयो:। धातु से मन प्रत्त्याय बन कर धर्म शब्द बना है,धर्म का अर्थ ही 'धारण' करना है।
भारत की संस्कृति आध्यात्म की सुध्र
स्थिति है, जो भारत के महान त्रिकालदर्शियों, ऋषि, मुनियों द्वारा स्थापित है जिन्होंने अपने दिव्य ज्ञान से अपने सिद्धांत स्थिर किए, जो सर्वथा सत्य और प्रामाणिक हैं।
इस संसार में सब कुछ एक नियम के अनुसार संपादित हो रहा है। पृथ्वी हो या आकाश, ग्रह -नक्षत्र, सूर्य -चंद्रमा, जल-वायु, जड़ -चेतन, जीवन-मृत्यु आदि सभी नियम के अनुरूप संपन्न हो रहे हैं, यही नियम वास्तविक धर्म है जिसे प्रत्येक जीवधारी स्वयं में धारण किए हुए है। प्रकृति के नियमों को बदला नही जा सकता। इसी नियम को संपादन करने वाली शक्ति ही 'ईश्वर' है। ईश्वर के इस नियम को प्रत्यक्ष देखने वाले विशिष्ट शक्ति संपन्न इश्वारानुग्रहित पुरूष का नाम ही 'ऋषि' है। इन्ही ऋषियों के दिव्य ज्ञान और अनुभवों के आधार पर ईश्वरीय प्रेरणा से आबद्ध सर्वविध कल्याण के लिए रचे सनातन नियम जो धर्म ग्रंथो में संगृहीत हैं वही 'शास्त्र' हैं, और यही प्रधान चार आधार स्तंभ हैं, जिसमे हमारे भारत की संस्कृति व्यवस्थित है। इसी ऋषि परम्परा को मानने वाला मानव स्वयं 'ऋषि पुत्र' है जिससे हमारा 'गोत्र 'बना है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि हमारा जीवन अपने आप में कितना महत्वपूर्ण है। सूर्य और चंद्रमा में भेद करने वाला मानव क्या ये समझ पाया कि इसे व्यवस्थित रखने वाला आकाश एक है। सत्य तो यह है कि धर्म के नाम पर लोग आज सजग तो हैं पर सहज नही है। कोई भी धर्मशास्त्र बैर नही सिखाता। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख हो या ईसाई, किसी धर्मशास्त्र में किसी भी दूसरे धर्म की बुराई नही लिखी है। इस संसार में ईश्वर ने मनुष्य को समान ही बनाया। केवल सत्य की राह में चलने और उस तक पहुचने के लिए ही महान ग्रंथो की रचना हुई।

साभार संकलन कई श्रोतों से

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली के शुभ अवसर पर सभी समाज बंधुओं को हार्दिक शुभकामनायें।



होली के शुभ अवसर पर सभी समाज बंधुओंको हार्दिक शुभकामनायें. आइये हम सबअपने परिवार और समाज में रंग भरें।


मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

लक्ष्मी पूजन कैसे करें? (how to worship goddess laxmi on this diwali?)

सर्व प्रथम अचल एवं चल सम्पतियों को देने वाली माँ भगवती की नूतन प्रतिमा एक चौकी पर कपड़ा बिछा कर उत्तर या पूरब में स्थापित करें तथा उस कपड़े पर केसर और चन्दन से अष्ट दल कमल बना कर माँ भगवती के चरणों में अपने घर की धन संपदा आदि अर्पित करें. देवी के बायीं और विघ्न विनाषक अमंगलों के हरने वाले भगवान गणेश जी की स्थापना करें . इसके बाद स्नान आचमन आदि से निवृत हो कर उत्तर या पूर्व मुख बेठ कर भगवान श्री हरी या अपने गुरु का ध्यान करें .
इसके बाद अष्ट सिद्धियाँ देने वाली तथा नों निद्धियाँ देने वाली माँ भगवती के पूजन का संकल्प लें.

संकल्प: ॐ विष्णुए नमः, महालछ्मीए नमः, श्री गणेशाये नमः ,श्री श्वेतवारहकल्पे, वैवस्वमनावंतारे अष्ष्टाविंशतितमे, कल्युगे, कलिप्रथम चरणे, बोद्धावतारे, भूलोके, जम्बो दीपे, भारत खंडे, भारत वर्षे, --------- क्षेत्रे, ------नगरे --------संवत्सरे कार्तिक मासे कृषण पक्षे, अमावस्या नाम पुण्य तिथे, संवत 2066 सका 1931 अमुक नामं ------------सपुत्रं----------, अमुक गोत्रं-------------गोत्रं, अमुक ऋषि नाम -------------नाम, तस्य शुभ अवसरे यथा ग्रिहवालम महालक्ष्मी अस्ट सिद्ध दात्री, नो निधि दात्री, महालक्ष्मीसेय पूजनं परिवार सव्मित्र जन सहयोगे यथा शक्ति पूजनं कर्सते गणेशा देवता संकल्प कर्स्येते.

संकल्प करने के बाद गणेश जी का रिद्धि सिद्धि के साथ ध्यान करें तथा पञ्च उपचार से या यथा लाब्धौप्चार से या शोडास उपचार से पूजन करें. गणेश पूजन के बाद इसी उपचार से कलश पूजन करें .पूजन से पहले कलश को इशान दिशा (नॉर्थ ईस्ट) में ही स्थापित करना चाहिए.
कलश पूजन के बाद में भगवान शिव पार्वती जी का पूजन तथा ओमकार पूजन करें , इसके बाद महालक्ष्मी का भगवान श्री नारायण जी के साथ आवाहन तथा पूजन करें एवं श्रृंगार की वस्तुएं भी भेंट करें . देवी के पूजन के बाद में रोली कुमकुम युक्त चावल से अंगो का पूजन करें.
ॐ चपलायै नमः (पैरों का पूजन करें)
ॐ चंचलायै नमः (जांघों का पूजन करें)
ॐ कमलायै नमः (कमर का पूजन करें)
ॐ कात्यायन्यै नमः (नाभि पूजन करें)
ॐ जगन्मात्रे नमः (पेट का पूजन करें)
ॐ विश्ववल्लभायै नमः (छाती का पूजन करें)
ॐ कमल्वासिन्यै नमः (हाथों का पूजन करें)
ॐ पद्नाननायै नमः (मुख पूजन करें)
ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः (नेत्रों का पूजन करें)
ॐ श्रियै नमः (सिर का पूजन करें)
ॐ महालक्ष्म्यै नमः (सर्वांग पूजन करें)

इसके बाद अष्ट सिद्धि पूजन करें उसके लिए कुमकुम युक्त चावल देवी की प्रतिमा के पास आठ दिशाओं में छोडें
ॐ अणिम्ने नमः पूरब
ॐ महिम्ने नमः अग्नि कोने (दक्षिण पूरब )
ॐ गरिम्णयै नमः दक्षिण
ॐ लघिम्ने नमः नेर्त्रित्य (पश्चिम दक्षिण )
ॐ प्राप्तयै नमः पश्चिम
ॐ प्राकाम्यै नमः व्यावय (उत्तर पश्चिम )
ॐ ईशितायै नमः उत्तर
ॐ वशितायै नमः इशान (उत्तर पूरब )

इसके बाद अष्ट लक्ष्मी पूजन इस प्रकार करें:
लक्ष्मी की मूर्ति की आठों दिशाओं में कुमकुम युक्त चावल एवंम पुष्प लेकर आठों सिद्धियों का इस प्रकार ध्यान करते हुए पूजन करें .
ॐ आदि लक्ष्मीयै नमः
ॐ विद्या लक्ष्मीयै नमः
ॐ सौभाग्य लक्ष्मीयै नमः
ॐ अमृत लक्ष्मीयै नमः
ॐ काम लक्ष्मीयै नमः
ॐ सप्त लक्ष्मीयै नमः
ॐ भोग लक्ष्मीयै नमः
ॐ योग लक्ष्मीयै नमः

इस प्रकार अष्ट लक्ष्मी पूजन के बाद, महालक्ष्मी को धुप और दीप के दर्शन करांए तथा नेवेद्यम (मिठाई) अर्पित करें. इसके बाद देवी के हाथ में चन्दन लगायें तथा आचमन के लिए जल दे व् फल चढाये. अब पान का पत्ता अर्पित करें. देवी के चरणों में अब धन (रुपये / पैसे) चढाएं. माँ भगवती की आरती करें तथा अपने पापों के नाश के लिए प्रदक्षिणा तथा प्रार्थना करें . लक्ष्मी पूजन पश्चात्
घर की देहलीज पर स्वास्तिक बनाकर देहली विनायक का पूजन करें .
अपने खाते को लिखने वाली स्याही का माँ कलि के रूप में पूजन करें एवं लेखनी का पूजन माँ सरस्वती के रूप में करें इसके बाद किसी थाली में केसर युक्त चन्दन व रोली से स्वास्तिक बना कर पञ्च गांठें हल्दी, धनिया, कमल गठा, अक्षत (चावल ) व दूब रख कर सरस्वती का ध्यान करते हुए पुन्जिका (बही खाता) का पूजन करें .
कुबेर जी ध्यान व पूजन करें तथा हल्दी, धनिया, कमल गठा, दूब व पैसा तिजोरी में रखें तथा तराजू पर सिंदूर से स्वास्तिक बना कर मान सम्मान हेतु पूजन करें.
फिर दीपक का पूजन करें तथा देवी की प्रधान आरती करें .
तत्पश्चात पुष्पांजली अर्पित कर प्रार्थना करें .
इसके बाद माँ लक्ष्मी को शाष्टाग प्रणाम कर शुद्ध जल से अपने हाथ धोएं व संकीर्तन करें।

(संकलन - कई श्रोतों से, श्लोकों के शुद्ध उच्चारण के लिए विशेषज्ञ की सलाह उचित साधन है)