रविवार, 28 फ़रवरी 2010
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009
लक्ष्मी पूजन कैसे करें? (how to worship goddess laxmi on this diwali?)
सर्व प्रथम अचल एवं चल सम्पतियों को देने वाली माँ भगवती की नूतन प्रतिमा एक चौकी पर कपड़ा बिछा कर उत्तर या पूरब में स्थापित करें तथा उस कपड़े पर केसर और चन्दन से अष्ट दल कमल बना कर माँ भगवती के चरणों में अपने घर की धन संपदा आदि अर्पित करें. देवी के बायीं और विघ्न विनाषक अमंगलों के हरने वाले भगवान गणेश जी की स्थापना करें . इसके बाद स्नान आचमन आदि से निवृत हो कर उत्तर या पूर्व मुख बेठ कर भगवान श्री हरी या अपने गुरु का ध्यान करें .
संकल्प: ॐ विष्णुए नमः, महालछ्मीए नमः, श्री गणेशाये नमः ,श्री श्वेतवारहकल्पे, वैवस्वमनावंतारे अष्ष्टाविंशतितमे, कल्युगे, कलिप्रथम चरणे, बोद्धावतारे, भूलोके, जम्बो दीपे, भारत खंडे, भारत वर्षे, --------- क्षेत्रे, ------नगरे --------संवत्सरे कार्तिक मासे कृषण पक्षे, अमावस्या नाम पुण्य तिथे, संवत 2066 सका 1931 अमुक नामं ------------सपुत्रं----------, अमुक गोत्रं-------------गोत्रं, अमुक ऋषि नाम -------------नाम, तस्य शुभ अवसरे यथा ग्रिहवालम महालक्ष्मी अस्ट सिद्ध दात्री, नो निधि दात्री, महालक्ष्मीसेय पूजनं परिवार सव्मित्र जन सहयोगे यथा शक्ति पूजनं कर्सते गणेशा देवता संकल्प कर्स्येते.
संकल्प करने के बाद गणेश जी का रिद्धि सिद्धि के साथ ध्यान करें तथा पञ्च उपचार से या यथा लाब्धौप्चार से या शोडास उपचार से पूजन करें. गणेश पूजन के बाद इसी उपचार से कलश पूजन करें .पूजन से पहले कलश को इशान दिशा (नॉर्थ ईस्ट) में ही स्थापित करना चाहिए.
कलश पूजन के बाद में भगवान शिव पार्वती जी का पूजन तथा ओमकार पूजन करें , इसके बाद महालक्ष्मी का भगवान श्री नारायण जी के साथ आवाहन तथा पूजन करें एवं श्रृंगार की वस्तुएं भी भेंट करें . देवी के पूजन के बाद में रोली कुमकुम युक्त चावल से अंगो का पूजन करें.
ॐ चपलायै नमः (पैरों का पूजन करें)
ॐ चंचलायै नमः (जांघों का पूजन करें)
ॐ कमलायै नमः (कमर का पूजन करें)
ॐ कात्यायन्यै नमः (नाभि पूजन करें)
ॐ जगन्मात्रे नमः (पेट का पूजन करें)
ॐ विश्ववल्लभायै नमः (छाती का पूजन करें)
ॐ कमल्वासिन्यै नमः (हाथों का पूजन करें)
ॐ पद्नाननायै नमः (मुख पूजन करें)
ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः (नेत्रों का पूजन करें)
ॐ श्रियै नमः (सिर का पूजन करें)
ॐ महालक्ष्म्यै नमः (सर्वांग पूजन करें)
इसके बाद अष्ट सिद्धि पूजन करें उसके लिए कुमकुम युक्त चावल देवी की प्रतिमा के पास आठ दिशाओं में छोडें
ॐ अणिम्ने नमः पूरब
ॐ महिम्ने नमः अग्नि कोने (दक्षिण पूरब )
ॐ गरिम्णयै नमः दक्षिण
ॐ लघिम्ने नमः नेर्त्रित्य (पश्चिम दक्षिण )
ॐ प्राप्तयै नमः पश्चिम
ॐ प्राकाम्यै नमः व्यावय (उत्तर पश्चिम )
ॐ ईशितायै नमः उत्तर
ॐ वशितायै नमः इशान (उत्तर पूरब )
इसके बाद अष्ट लक्ष्मी पूजन इस प्रकार करें:
लक्ष्मी की मूर्ति की आठों दिशाओं में कुमकुम युक्त चावल एवंम पुष्प लेकर आठों सिद्धियों का इस प्रकार ध्यान करते हुए पूजन करें .
ॐ आदि लक्ष्मीयै नमः
ॐ विद्या लक्ष्मीयै नमः
ॐ सौभाग्य लक्ष्मीयै नमः
ॐ अमृत लक्ष्मीयै नमः
ॐ काम लक्ष्मीयै नमः
ॐ सप्त लक्ष्मीयै नमः
ॐ भोग लक्ष्मीयै नमः
ॐ योग लक्ष्मीयै नमः
इस प्रकार अष्ट लक्ष्मी पूजन के बाद, महालक्ष्मी को धुप और दीप के दर्शन करांए तथा नेवेद्यम (मिठाई) अर्पित करें. इसके बाद देवी के हाथ में चन्दन लगायें तथा आचमन के लिए जल दे व् फल चढाये. अब पान का पत्ता अर्पित करें. देवी के चरणों में अब धन (रुपये / पैसे) चढाएं. माँ भगवती की आरती करें तथा अपने पापों के नाश के लिए प्रदक्षिणा तथा प्रार्थना करें . लक्ष्मी पूजन पश्चात्
घर की देहलीज पर स्वास्तिक बनाकर देहली विनायक का पूजन करें .
अपने खाते को लिखने वाली स्याही का माँ कलि के रूप में पूजन करें एवं लेखनी का पूजन माँ सरस्वती के रूप में करें इसके बाद किसी थाली में केसर युक्त चन्दन व रोली से स्वास्तिक बना कर पञ्च गांठें हल्दी, धनिया, कमल गठा, अक्षत (चावल ) व दूब रख कर सरस्वती का ध्यान करते हुए पुन्जिका (बही खाता) का पूजन करें .
कुबेर जी ध्यान व पूजन करें तथा हल्दी, धनिया, कमल गठा, दूब व पैसा तिजोरी में रखें तथा तराजू पर सिंदूर से स्वास्तिक बना कर मान सम्मान हेतु पूजन करें.
फिर दीपक का पूजन करें तथा देवी की प्रधान आरती करें .
तत्पश्चात पुष्पांजली अर्पित कर प्रार्थना करें .
इसके बाद माँ लक्ष्मी को शाष्टाग प्रणाम कर शुद्ध जल से अपने हाथ धोएं व संकीर्तन करें।
(संकलन - कई श्रोतों से, श्लोकों के शुद्ध उच्चारण के लिए विशेषज्ञ की सलाह उचित साधन है)
इसके बाद अष्ट सिद्धियाँ देने वाली तथा नों निद्धियाँ देने वाली माँ भगवती के पूजन का संकल्प लें.
संकल्प: ॐ विष्णुए नमः, महालछ्मीए नमः, श्री गणेशाये नमः ,श्री श्वेतवारहकल्पे, वैवस्वमनावंतारे अष्ष्टाविंशतितमे, कल्युगे, कलिप्रथम चरणे, बोद्धावतारे, भूलोके, जम्बो दीपे, भारत खंडे, भारत वर्षे, --------- क्षेत्रे, ------नगरे --------संवत्सरे कार्तिक मासे कृषण पक्षे, अमावस्या नाम पुण्य तिथे, संवत 2066 सका 1931 अमुक नामं ------------सपुत्रं----------, अमुक गोत्रं-------------गोत्रं, अमुक ऋषि नाम -------------नाम, तस्य शुभ अवसरे यथा ग्रिहवालम महालक्ष्मी अस्ट सिद्ध दात्री, नो निधि दात्री, महालक्ष्मीसेय पूजनं परिवार सव्मित्र जन सहयोगे यथा शक्ति पूजनं कर्सते गणेशा देवता संकल्प कर्स्येते.
संकल्प करने के बाद गणेश जी का रिद्धि सिद्धि के साथ ध्यान करें तथा पञ्च उपचार से या यथा लाब्धौप्चार से या शोडास उपचार से पूजन करें. गणेश पूजन के बाद इसी उपचार से कलश पूजन करें .पूजन से पहले कलश को इशान दिशा (नॉर्थ ईस्ट) में ही स्थापित करना चाहिए.
कलश पूजन के बाद में भगवान शिव पार्वती जी का पूजन तथा ओमकार पूजन करें , इसके बाद महालक्ष्मी का भगवान श्री नारायण जी के साथ आवाहन तथा पूजन करें एवं श्रृंगार की वस्तुएं भी भेंट करें . देवी के पूजन के बाद में रोली कुमकुम युक्त चावल से अंगो का पूजन करें.
ॐ चपलायै नमः (पैरों का पूजन करें)

ॐ चंचलायै नमः (जांघों का पूजन करें)
ॐ कमलायै नमः (कमर का पूजन करें)
ॐ कात्यायन्यै नमः (नाभि पूजन करें)
ॐ जगन्मात्रे नमः (पेट का पूजन करें)
ॐ विश्ववल्लभायै नमः (छाती का पूजन करें)
ॐ कमल्वासिन्यै नमः (हाथों का पूजन करें)
ॐ पद्नाननायै नमः (मुख पूजन करें)
ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः (नेत्रों का पूजन करें)
ॐ श्रियै नमः (सिर का पूजन करें)
ॐ महालक्ष्म्यै नमः (सर्वांग पूजन करें)
इसके बाद अष्ट सिद्धि पूजन करें उसके लिए कुमकुम युक्त चावल देवी की प्रतिमा के पास आठ दिशाओं में छोडें
ॐ अणिम्ने नमः पूरब
ॐ महिम्ने नमः अग्नि कोने (दक्षिण पूरब )
ॐ गरिम्णयै नमः दक्षिण
ॐ लघिम्ने नमः नेर्त्रित्य (पश्चिम दक्षिण )
ॐ प्राप्तयै नमः पश्चिम
ॐ प्राकाम्यै नमः व्यावय (उत्तर पश्चिम )
ॐ ईशितायै नमः उत्तर
ॐ वशितायै नमः इशान (उत्तर पूरब )
इसके बाद अष्ट लक्ष्मी पूजन इस प्रकार करें:
लक्ष्मी की मूर्ति की आठों दिशाओं में कुमकुम युक्त चावल एवंम पुष्प लेकर आठों सिद्धियों का इस प्रकार ध्यान करते हुए पूजन करें .
ॐ आदि लक्ष्मीयै नमः
ॐ विद्या लक्ष्मीयै नमः
ॐ सौभाग्य लक्ष्मीयै नमः
ॐ अमृत लक्ष्मीयै नमः
ॐ काम लक्ष्मीयै नमः
ॐ सप्त लक्ष्मीयै नमः
ॐ भोग लक्ष्मीयै नमः
ॐ योग लक्ष्मीयै नमः
इस प्रकार अष्ट लक्ष्मी पूजन के बाद, महालक्ष्मी को धुप और दीप के दर्शन करांए तथा नेवेद्यम (मिठाई) अर्पित करें. इसके बाद देवी के हाथ में चन्दन लगायें तथा आचमन के लिए जल दे व् फल चढाये. अब पान का पत्ता अर्पित करें. देवी के चरणों में अब धन (रुपये / पैसे) चढाएं. माँ भगवती की आरती करें तथा अपने पापों के नाश के लिए प्रदक्षिणा तथा प्रार्थना करें . लक्ष्मी पूजन पश्चात्
घर की देहलीज पर स्वास्तिक बनाकर देहली विनायक का पूजन करें .
अपने खाते को लिखने वाली स्याही का माँ कलि के रूप में पूजन करें एवं लेखनी का पूजन माँ सरस्वती के रूप में करें इसके बाद किसी थाली में केसर युक्त चन्दन व रोली से स्वास्तिक बना कर पञ्च गांठें हल्दी, धनिया, कमल गठा, अक्षत (चावल ) व दूब रख कर सरस्वती का ध्यान करते हुए पुन्जिका (बही खाता) का पूजन करें .
कुबेर जी ध्यान व पूजन करें तथा हल्दी, धनिया, कमल गठा, दूब व पैसा तिजोरी में रखें तथा तराजू पर सिंदूर से स्वास्तिक बना कर मान सम्मान हेतु पूजन करें.
फिर दीपक का पूजन करें तथा देवी की प्रधान आरती करें .
तत्पश्चात पुष्पांजली अर्पित कर प्रार्थना करें .
इसके बाद माँ लक्ष्मी को शाष्टाग प्रणाम कर शुद्ध जल से अपने हाथ धोएं व संकीर्तन करें।
(संकलन - कई श्रोतों से, श्लोकों के शुद्ध उच्चारण के लिए विशेषज्ञ की सलाह उचित साधन है)
शनिवार, 29 अगस्त 2009
गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या जानने के लिए सर्वे |
पिछले कुछ समय से गौड़ ब्राह्मणों की जनसँख्या जानने के लिए एक सर्वे किया गया। ज्यादातर लोगों की राय में७५%) सबसे ज्यादा गौड़ ब्राह्मण मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसते हैं। २५ % लोगों की राय दिल्ली औरहरयाणा के पक्ष में थी तथा १२.५ % लोगों ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को सबसे ज्यादा गौड़ब्राहमणों का मुख्य प्रदेश बताया।
यह अभी कहना मुस्किल है की किस प्रदेश में गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या सबसे ज्यादा है। पर एक निष्कर्षस्वाभाविक रूप से उभर कर सामने आया, कि गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या सबसे ज्यादा राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरयाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेशों तक सीमित है। यह निष्कर्ष १६ मतों केऊपर आधारित है जो इस साईट पर उपलब्ध सर्वे के द्वारा लोगों के दिए।
यह अभी कहना मुस्किल है की किस प्रदेश में गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या सबसे ज्यादा है। पर एक निष्कर्षस्वाभाविक रूप से उभर कर सामने आया, कि गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या सबसे ज्यादा राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरयाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेशों तक सीमित है। यह निष्कर्ष १६ मतों केऊपर आधारित है जो इस साईट पर उपलब्ध सर्वे के द्वारा लोगों के दिए।
रविवार, 12 जुलाई 2009
प्रभु कृपा दुःख दूर करती है |
इस संसार में जीवों को अनेक सुख-दुखों के साथ जीवन चक्र पूरा करना ही होता है यही प्रकृति का नियम (विधि का विधान) है | लेकिन हम मनुष्यों की उत्कंठा हमेशा दुखों को समाप्त करने की रही है | हम दुखों से सबसे ज्यादा घबराते है तथा उन्हें कम करने के उपाय तलाशते हैं | ज्योतिषाचार्य कई विधान बताते है ग्रहों को सांत करने तथा कष्टों को कम करने के लिए जिनसे बहुत लोग वाफिक हैं |

तुलसी कृत रामचरित मानस से हमें ज्योतिष शास्त्र का उस समय से पूर्व प्रचलन का तथा महत्वपूर्ण सूत्रों का पता चलता है | गोस्वामी तुलसी दास जी ने प्रभु कृपा पर बड़ा जोर दिया है | उन्होंने लिखा है कि इस संसार में जितने भी दुःख हैं, चाहे वह मानसिक, शारीरिक और भोतिक, किसी भी तरह के क्यों न हों, भगवान की कृपा बगैर दूर नहीं होते | रामचरित मानस से कुछ महत्वपूर्ण सूत्र यहाँ उद्धरित हैं:
एक व्याधि बस न मरहीं, ए असाधि बहु व्याधि,
पीड़ही संतत जीव कह सों कहि लहें समाधि |
नेम धर्म आचार तप ग्यान जज्ञ जप दान,
मेषज पूति कीटिन्ह नहीं रोग जाहि हरिजान ||
भावार्थ : जहाँ मनुष्य का जीवन समाप्त करने के लिए या अत्यंत दुःख देने के लिए एक व्याधि ही बहुत है, वहां ऐसी असाध्य बीमारियों की तो गणना ही नहीं है और यह रोग ऐसे हैं जिनके निवारण के लिए कोई जप, यज्ञ, दान इत्यादि काम नहीं करते |
सकल विघ्न व्यापति नहीं तेजी,
राम सुकृपा विलकिहीं जेहि |
भावार्थ : इस नासवान संसार में समस्त विघ्न उस मनुष्य को तंग नहीं करते जिसको भगवान अपनी कृपा द्रष्टि से देखते हैं |
राम कृपा नासही सब रोगा |
जे एही भांति बने सन्जोगा ||
भावार्थ : राम कृपा समस्त रोगों का नाश करने वाली है तथा जब कृपा होती है तो समस्या समाधान के अनेक संयोग बन जाते हैं ||
रामचरित मानस से दो और सूत्र यहाँ दिए हैं जो दुखों से दूर रहने में सहायक हैं:
बिना संतोष न कम नसही |
कम अछत सुख सपनेहु नाही ||
भावार्थ : संतोष ही सबसे बड़ा धन है और जब तक संतोष नहीं होता, तब तक कामनाओ का नाश नहीं होता और इसी प्रकार जब तक कामना रहती है, मनुष्य स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता |
बमोह सकल व्याधिन्ह कर मूला |
तिन ते पुनि उपजहि बहु सूला ||
भावार्थ : किसी वस्तु विशेष से लगाव या प्रेम समस्त व्याधियों की जड़ है | इससे कई तरह के कष्ट रुपी कांटे उपजते है |
आभार : गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित 'श्री राम चरित मानस'
रविवार, 31 मई 2009
Are you a Dwij?
A Brahmin is not supposed to claim Brahmin status by birth. He must be reborn by learning and attain Brahminical status through the achievement of a mental and cultural status befitting a Brahmin. Any one born low could become a Brahmin by elevating his learning and conduct and similarly one who had achieved Brahmanical status could be pushed to a lower strata if his conduct became to demand such relegation. A Brahmin must be "Re-born" and that is why he is called "Dwij- twice born".
It is to be noted that Vishwamitra was initially a Kshatriya king, who later chose and rose to become an ascetic rishi and was included in 'brahmrishis' (earlier brahmrishis :- Angira, Atri, Gautam, Kashyap, Bhrigu, Vashistha and Bharadwaj)
रविवार, 24 मई 2009
मांगलिक कुंडली
ज्योतिष की परिभाषा में मंगल अग्नि प्रधान गृह होने के कारन अनिष्ट फल प्रदान करने में देर नहीं करता. यही वजह है की भावी वर वधु की कुंडली मिलाने में मांगलिक गुणों को मिलाना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. यह परंपरागत/ सनातन मान्यता है कि यदि वर की कुंडली मांगलिक है तो वधु की कुंडली भी मांगलिक होनी चाहिए.
किसी भी कुंडली में यदि मंगल अशुभ फल देने वाला है तो वह किसी न किसी तरह अनिष्ट करेगा ही. लेकिन मंगल की कुछ स्तिथियाँ ऐसी होतीं हैं जो वर/ वधु या फिर उनके दाम्पत्य जीवन के लिए घातक होती हैं. इन्ही कुछ विशिष्ट स्तिथि वाली कुंडलियों को ही मांगलिक कुंडली कहा जाता है. साधारण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी यह जान सकता है की अमुक कुंडली मांगलिक है या नहीं.
किसी भी जन्म कुंडली में 'लग्न' कुंडली को ध्यान से देखो. लग्न कुंडली प्रायः सबसे पहले वाली कुंडली होती है.

यदि मंगल की स्तिथि यहाँ दिए गए चित्र की किसी भी स्तिथि से मेल खाती है तो कुंडली मांगलिक है. ज्योतिष के अनुसार अशुभ मंगल की प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादस स्थानों में उपस्थिति दांपत्य जीवन नष्ट करने वाली होती है.
मांगलिक कुंडली कोई दोष या शाप नहीं है क्योंकि, मंगल कुंडली से बाहर तो हो नहीं सकता. सिर्फ मांगलिक कुंडली जानने के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है. कुंडली मिलाने में यह भी देखा जाता है की मंगल शुभ फल देने वाला है या फिर अशुभ. क्या मंगली भंग योग भी बनता है. शनि और गुरु की शुभ स्तिथि मंगल के दोषों को समाप्त कर देने वाली है.
धार्मिक परंपरा के अनुसार यदि मजबूरी में मांगलिक कन्या या वर का विवाह किसी अमांगलिक के साथ करना भी पड़े, तो विवाह मुहूर्त से पहले कन्या के फेरे विष्णु प्रतिमा से करने का उपाय मंगल को शांत करने वाला बताया है.
तर्कसंगत यही है कि मांगलिक कुंडली होने पर, विवाह पूर्व ज्योतिषीय सलाह एक उचित समाधान हो सकता है.
रविवार, 17 मई 2009
परम संत बाबा सूरदास जी की मूर्ति स्थापना एवं भागवत कथा ज्ञान यज्ञ समारोह
परम संत बाबा सूरदास जी चम्बल संभाग के अति पूज्यनीय गुरु हैं जिनके शिष्यों के संख्या अनेको में है. यह संयोग की बात है की बाबा सूरदास जी ने आदि गौड़ ब्राह्मण कुल में जन्म लिया तथा चेचक से अपने नेत्र खोने के साथ बचपन से ही सन्यासी हो गए. वे भगवान राम एवं हनुमान के परम भक्त थे तथा उनके तप और साधना की पराकास्ठा उद्धर्नीय है. उन्होंने कई बार २१ दिन तक जमीन के अन्दर समाधि ले कर तप किया जिसके साक्षी कई हैं.

आदि गौड़ ब्राह्मण सभा की जौरा इकाई ने बाबा सूरदास जी के मार्ग दर्शन में श्री राम जानकी मंदिर की स्थापना सन २००१ में की. बाबा सूरदास जी जब भी जौरा आते तब श्री राम जानकी मंदिर ही उनका स्थान होता था. उन्होंने ही हर वर्ष मंदिर पर भागवत कथा ज्ञान यज्ञ करने का मार्ग प्रशस्त किया.
इस वर्ष उनके कृपा पात्र शिष्यों ने संत बाबा सूरदास की मूर्ति की स्थापना मंदिर प्रांगण में करने का निर्णय लिया है. इसके उपलक्ष में निम्न लिखित कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे:
२२ मई २००९ : मूर्ति स्थापना तथा भागवत कथा ज्ञान यज्ञ प्रारंभ
२९ मई २००९ : भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सम्पन्न एवं भंडारा
कार्यक्रम स्थल : श्री राम जानकी मंदिर, चम्बल कालोनी के पास, एम् एस रोड, जौरा जिला मुरेना (मध्य प्रदेश), भारत
परम संत बाबा सूरदास जी के प्रति आस्था रखने वाले सदस्य इस महा योजन को सफल बनायेंगे एसी हमारी आशा है.
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