रविवार, 6 जून 2010

आदि गौड़ समाज का करोली में पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन संपन्न.

गत दिनांक २७ मई २०१० को आदि गौड़ समाज का करोली में पहला सामूहिक विवाह सम्मेलन ३९ जोड़ो के विवाह के साथ संपन्न हुआ. हम सब की ओर से नवविवाहित एवं उनके परिवारों को सुभकामनाये और सम्मेलन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले तथा अपनी उपस्थिती और आशीर्वाद देने वाले महानुभावों को धन्यवाद. (अधिक जानकारी और चित्रों के लिए Event पेज देखें).

मंगलवार, 16 मार्च 2010

वसंत नवरात्रि, उगादी और गुडी पडवा

 उगादी जिसे युगादी से भी जानते हैं, का मतलब है एक नए युग का प्रारंभ. इस वर्ष उगादी त्यौहार मनाया जा रहा है १६ मार्च २०१० के दिन. इस दिन विक्रमी संवत, सक संवत, सिन्धी नववर्ष तथा तेलगू और कन्नड़ नव वर्ष प्रारंभ होता है.


श्री विक्रम संवत - २०६७
राष्ट्रीय सक संवत - १९३२


इस त्यौहार को भारत में गुडी पडवा, उगादी (कर्णाटक और आंध्र प्रदेश), चेती चाँद (सिन्धी) आदि कई नामों से मानते हैं.


वसंत नवरात्रि (चैत्र नवरात्रि) पूजा भी आज के दिन से प्रारंभ होती है. आज के दिन से ही भगवान राम नवमी उत्सव प्रारंभ होता है. यह दोनों ही उत्सव राम नवमी (नौवे दिन) संपन्न होते हैं.  


समाज बंधुओं को सपरिवार बधाई. 

शनिवार, 6 मार्च 2010

धारण ही धर्म!


भारतवर्ष का मूलाधार 'आध्यात्म ' है, जो धर्म के रूप में भिन्न -भिन्न मान्यताओं एवं आस्थाओं के साथ जनमानस में व्याप्त है। इस संसार में, खास कर भारत वर्ष में सैंकड़ों धर्म है जिनके अपने अलग अलग विधान हैं।
धृ धारण पोषणयो:। धातु से मन प्रत्त्याय बन कर धर्म शब्द बना है,धर्म का अर्थ ही 'धारण' करना है।
भारत की संस्कृति आध्यात्म की सुध्र
स्थिति है, जो भारत के महान त्रिकालदर्शियों, ऋषि, मुनियों द्वारा स्थापित है जिन्होंने अपने दिव्य ज्ञान से अपने सिद्धांत स्थिर किए, जो सर्वथा सत्य और प्रामाणिक हैं।
इस संसार में सब कुछ एक नियम के अनुसार संपादित हो रहा है। पृथ्वी हो या आकाश, ग्रह -नक्षत्र, सूर्य -चंद्रमा, जल-वायु, जड़ -चेतन, जीवन-मृत्यु आदि सभी नियम के अनुरूप संपन्न हो रहे हैं, यही नियम वास्तविक धर्म है जिसे प्रत्येक जीवधारी स्वयं में धारण किए हुए है। प्रकृति के नियमों को बदला नही जा सकता। इसी नियम को संपादन करने वाली शक्ति ही 'ईश्वर' है। ईश्वर के इस नियम को प्रत्यक्ष देखने वाले विशिष्ट शक्ति संपन्न इश्वारानुग्रहित पुरूष का नाम ही 'ऋषि' है। इन्ही ऋषियों के दिव्य ज्ञान और अनुभवों के आधार पर ईश्वरीय प्रेरणा से आबद्ध सर्वविध कल्याण के लिए रचे सनातन नियम जो धर्म ग्रंथो में संगृहीत हैं वही 'शास्त्र' हैं, और यही प्रधान चार आधार स्तंभ हैं, जिसमे हमारे भारत की संस्कृति व्यवस्थित है। इसी ऋषि परम्परा को मानने वाला मानव स्वयं 'ऋषि पुत्र' है जिससे हमारा 'गोत्र 'बना है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि हमारा जीवन अपने आप में कितना महत्वपूर्ण है। सूर्य और चंद्रमा में भेद करने वाला मानव क्या ये समझ पाया कि इसे व्यवस्थित रखने वाला आकाश एक है। सत्य तो यह है कि धर्म के नाम पर लोग आज सजग तो हैं पर सहज नही है। कोई भी धर्मशास्त्र बैर नही सिखाता। हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख हो या ईसाई, किसी धर्मशास्त्र में किसी भी दूसरे धर्म की बुराई नही लिखी है। इस संसार में ईश्वर ने मनुष्य को समान ही बनाया। केवल सत्य की राह में चलने और उस तक पहुचने के लिए ही महान ग्रंथो की रचना हुई।

साभार संकलन कई श्रोतों से

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

होली के शुभ अवसर पर सभी समाज बंधुओं को हार्दिक शुभकामनायें।



होली के शुभ अवसर पर सभी समाज बंधुओंको हार्दिक शुभकामनायें. आइये हम सबअपने परिवार और समाज में रंग भरें।


मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

लक्ष्मी पूजन कैसे करें? (how to worship goddess laxmi on this diwali?)

सर्व प्रथम अचल एवं चल सम्पतियों को देने वाली माँ भगवती की नूतन प्रतिमा एक चौकी पर कपड़ा बिछा कर उत्तर या पूरब में स्थापित करें तथा उस कपड़े पर केसर और चन्दन से अष्ट दल कमल बना कर माँ भगवती के चरणों में अपने घर की धन संपदा आदि अर्पित करें. देवी के बायीं और विघ्न विनाषक अमंगलों के हरने वाले भगवान गणेश जी की स्थापना करें . इसके बाद स्नान आचमन आदि से निवृत हो कर उत्तर या पूर्व मुख बेठ कर भगवान श्री हरी या अपने गुरु का ध्यान करें .
इसके बाद अष्ट सिद्धियाँ देने वाली तथा नों निद्धियाँ देने वाली माँ भगवती के पूजन का संकल्प लें.

संकल्प: ॐ विष्णुए नमः, महालछ्मीए नमः, श्री गणेशाये नमः ,श्री श्वेतवारहकल्पे, वैवस्वमनावंतारे अष्ष्टाविंशतितमे, कल्युगे, कलिप्रथम चरणे, बोद्धावतारे, भूलोके, जम्बो दीपे, भारत खंडे, भारत वर्षे, --------- क्षेत्रे, ------नगरे --------संवत्सरे कार्तिक मासे कृषण पक्षे, अमावस्या नाम पुण्य तिथे, संवत 2066 सका 1931 अमुक नामं ------------सपुत्रं----------, अमुक गोत्रं-------------गोत्रं, अमुक ऋषि नाम -------------नाम, तस्य शुभ अवसरे यथा ग्रिहवालम महालक्ष्मी अस्ट सिद्ध दात्री, नो निधि दात्री, महालक्ष्मीसेय पूजनं परिवार सव्मित्र जन सहयोगे यथा शक्ति पूजनं कर्सते गणेशा देवता संकल्प कर्स्येते.

संकल्प करने के बाद गणेश जी का रिद्धि सिद्धि के साथ ध्यान करें तथा पञ्च उपचार से या यथा लाब्धौप्चार से या शोडास उपचार से पूजन करें. गणेश पूजन के बाद इसी उपचार से कलश पूजन करें .पूजन से पहले कलश को इशान दिशा (नॉर्थ ईस्ट) में ही स्थापित करना चाहिए.
कलश पूजन के बाद में भगवान शिव पार्वती जी का पूजन तथा ओमकार पूजन करें , इसके बाद महालक्ष्मी का भगवान श्री नारायण जी के साथ आवाहन तथा पूजन करें एवं श्रृंगार की वस्तुएं भी भेंट करें . देवी के पूजन के बाद में रोली कुमकुम युक्त चावल से अंगो का पूजन करें.
ॐ चपलायै नमः (पैरों का पूजन करें)
ॐ चंचलायै नमः (जांघों का पूजन करें)
ॐ कमलायै नमः (कमर का पूजन करें)
ॐ कात्यायन्यै नमः (नाभि पूजन करें)
ॐ जगन्मात्रे नमः (पेट का पूजन करें)
ॐ विश्ववल्लभायै नमः (छाती का पूजन करें)
ॐ कमल्वासिन्यै नमः (हाथों का पूजन करें)
ॐ पद्नाननायै नमः (मुख पूजन करें)
ॐ कमलपत्राक्ष्यै नमः (नेत्रों का पूजन करें)
ॐ श्रियै नमः (सिर का पूजन करें)
ॐ महालक्ष्म्यै नमः (सर्वांग पूजन करें)

इसके बाद अष्ट सिद्धि पूजन करें उसके लिए कुमकुम युक्त चावल देवी की प्रतिमा के पास आठ दिशाओं में छोडें
ॐ अणिम्ने नमः पूरब
ॐ महिम्ने नमः अग्नि कोने (दक्षिण पूरब )
ॐ गरिम्णयै नमः दक्षिण
ॐ लघिम्ने नमः नेर्त्रित्य (पश्चिम दक्षिण )
ॐ प्राप्तयै नमः पश्चिम
ॐ प्राकाम्यै नमः व्यावय (उत्तर पश्चिम )
ॐ ईशितायै नमः उत्तर
ॐ वशितायै नमः इशान (उत्तर पूरब )

इसके बाद अष्ट लक्ष्मी पूजन इस प्रकार करें:
लक्ष्मी की मूर्ति की आठों दिशाओं में कुमकुम युक्त चावल एवंम पुष्प लेकर आठों सिद्धियों का इस प्रकार ध्यान करते हुए पूजन करें .
ॐ आदि लक्ष्मीयै नमः
ॐ विद्या लक्ष्मीयै नमः
ॐ सौभाग्य लक्ष्मीयै नमः
ॐ अमृत लक्ष्मीयै नमः
ॐ काम लक्ष्मीयै नमः
ॐ सप्त लक्ष्मीयै नमः
ॐ भोग लक्ष्मीयै नमः
ॐ योग लक्ष्मीयै नमः

इस प्रकार अष्ट लक्ष्मी पूजन के बाद, महालक्ष्मी को धुप और दीप के दर्शन करांए तथा नेवेद्यम (मिठाई) अर्पित करें. इसके बाद देवी के हाथ में चन्दन लगायें तथा आचमन के लिए जल दे व् फल चढाये. अब पान का पत्ता अर्पित करें. देवी के चरणों में अब धन (रुपये / पैसे) चढाएं. माँ भगवती की आरती करें तथा अपने पापों के नाश के लिए प्रदक्षिणा तथा प्रार्थना करें . लक्ष्मी पूजन पश्चात्
घर की देहलीज पर स्वास्तिक बनाकर देहली विनायक का पूजन करें .
अपने खाते को लिखने वाली स्याही का माँ कलि के रूप में पूजन करें एवं लेखनी का पूजन माँ सरस्वती के रूप में करें इसके बाद किसी थाली में केसर युक्त चन्दन व रोली से स्वास्तिक बना कर पञ्च गांठें हल्दी, धनिया, कमल गठा, अक्षत (चावल ) व दूब रख कर सरस्वती का ध्यान करते हुए पुन्जिका (बही खाता) का पूजन करें .
कुबेर जी ध्यान व पूजन करें तथा हल्दी, धनिया, कमल गठा, दूब व पैसा तिजोरी में रखें तथा तराजू पर सिंदूर से स्वास्तिक बना कर मान सम्मान हेतु पूजन करें.
फिर दीपक का पूजन करें तथा देवी की प्रधान आरती करें .
तत्पश्चात पुष्पांजली अर्पित कर प्रार्थना करें .
इसके बाद माँ लक्ष्मी को शाष्टाग प्रणाम कर शुद्ध जल से अपने हाथ धोएं व संकीर्तन करें।

(संकलन - कई श्रोतों से, श्लोकों के शुद्ध उच्चारण के लिए विशेषज्ञ की सलाह उचित साधन है)

शनिवार, 29 अगस्त 2009

गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या जानने के लिए सर्वे |

पिछले कुछ समय से गौड़ ब्राह्मणों की जनसँख्या जानने के लिए एक सर्वे किया गया। ज्यादातर लोगों की राय में७५%) सबसे ज्यादा गौड़ ब्राह्मण मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसते हैं। २५ % लोगों की राय दिल्ली औरहरयाणा के पक्ष में थी तथा १२. % लोगों ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को सबसे ज्यादा गौड़ब्राहमणों का मुख्य प्रदेश बताया।

यह अभी कहना मुस्किल है की किस प्रदेश में गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या सबसे ज्यादा है। पर एक निष्कर्षस्वाभाविक रूप से उभर कर सामने आया, कि गौड़ ब्राहमणों की जनसँख्या सबसे ज्यादा राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरयाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेशों तक सीमित है। यह निष्कर्ष १६ मतों केऊपर आधारित है जो इस साईट पर उपलब्ध सर्वे के द्वारा लोगों के दिए।

रविवार, 12 जुलाई 2009

प्रभु कृपा दुःख दूर करती है |

इस संसार में जीवों को अनेक सुख-दुखों के साथ जीवन चक्र पूरा करना ही होता है यही प्रकृति का नियम (विधि का विधान) है | लेकिन हम मनुष्यों की उत्कंठा हमेशा दुखों को समाप्त करने की रही है | हम दुखों से सबसे ज्यादा घबराते है तथा उन्हें कम करने के उपाय तलाशते हैं | ज्योतिषाचार्य कई विधान बताते है ग्रहों को सांत करने तथा कष्टों को कम करने के लिए जिनसे बहुत लोग वाफिक हैं |

तुलसी कृत रामचरित मानस से हमें ज्योतिष शास्त्र का उस समय से पूर्व प्रचलन का तथा महत्वपूर्ण सूत्रों का पता चलता है | गोस्वामी तुलसी दास जी ने प्रभु कृपा पर बड़ा जोर दिया है | उन्होंने लिखा है कि इस संसार में जितने भी दुःख हैं, चाहे वह मानसिक, शारीरिक और भोतिक, किसी भी तरह के क्यों न हों, भगवान की कृपा बगैर दूर नहीं होते | रामचरित मानस से कुछ महत्वपूर्ण सूत्र यहाँ उद्धरित हैं:
एक व्याधि बस न मरहीं, ए असाधि बहु व्याधि,
पीड़ही संतत जीव कह सों कहि लहें समाधि |
नेम धर्म आचार तप ग्यान जज्ञ जप दान,
मेषज पूति कीटिन्ह नहीं रोग जाहि हरिजान ||
भावार्थ : जहाँ मनुष्य का जीवन समाप्त करने के लिए या अत्यंत दुःख देने के लिए एक व्याधि ही बहुत है, वहां ऐसी असाध्य बीमारियों की तो गणना ही नहीं है और यह रोग ऐसे हैं जिनके निवारण के लिए कोई जप, यज्ञ, दान इत्यादि काम नहीं करते |
सकल विघ्न व्यापति नहीं तेजी,
राम सुकृपा विलकिहीं जेहि |
भावार्थ : इस नासवान संसार में समस्त विघ्न उस मनुष्य को तंग नहीं करते जिसको भगवान अपनी कृपा द्रष्टि से देखते हैं |
राम कृपा नासही सब रोगा |
जे एही भांति बने सन्जोगा ||
भावार्थ : राम कृपा समस्त रोगों का नाश करने वाली है तथा जब कृपा होती है तो समस्या समाधान के अनेक संयोग बन जाते हैं ||

रामचरित मानस से दो और सूत्र यहाँ दिए हैं जो दुखों से दूर रहने में सहायक हैं:
बिना संतोष न कम नसही |
कम अछत सुख सपनेहु नाही ||
भावार्थ : संतोष ही सबसे बड़ा धन है और जब तक संतोष नहीं होता, तब तक कामनाओ का नाश नहीं होता और इसी प्रकार जब तक कामना रहती है, मनुष्य स्वप्न में भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता |
बमोह सकल व्याधिन्ह कर मूला |
तिन ते पुनि उपजहि बहु सूला ||
भावार्थ : किसी वस्तु विशेष से लगाव या प्रेम समस्त व्याधियों की जड़ है | इससे कई तरह के कष्ट रुपी कांटे उपजते है |

आभार : गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रचित 'श्री राम चरित मानस'